..और फिर वो ख्वाबों का एक स्वेअटर जो मैं सदियों से बुन रही थी
हर एक ताना बाना धीरे धीरे पलकों से चुन रही थी
कच्चे धागों में उलझी सी..ऊन के गोले में सिमटी सी..
तुमने जाने कब आकर धीरे से हर सिलवट उसकी हटा दी..
ख्वाबों के उस स्वेअटर पर तुमने फूलों की टोकरी सजा दी..
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