Sunday, January 31, 2010

आँखें

यह जो मेरे पलकों की छांव है
उसके पीछे मेरे सपनो का छोटा सा एक गॉव है


एक नदी है जो कभी झरती है दिल की हलचल से
एक कंदील है जो चमकती है तुम्हारी आहट से
एक नन्हा सा घोंसला है दिल के पंछी का
एक आसमान है ऊँची उड़ान का ..

होसले की एक इमारत भी है
जो डगमगाती है पर बुलंद है
एक उम्मीद की सीढ़ी है जिसमे विश्वास की पैडी है


एक कच्चा पक्का पैड है  यादों का
जिसमें नए पुराने रंगों के फूल हैं
 कुछ मुरझाये फूलों पे ओस की नमी है
कुछ बंजर शाखों पे पल्लव की कमी है
मजबूत तना पर शाखें कमज़ोर हैं
कुछ नयी हरी कोपलें, कुछ अनछुई सपनो की कलियाँ हैं
पैड से  गुजरती कई पुरानी यादों की गलियां हैं


यह जो मेरे पलकों की छांव है
उसके पीछे मेरे सपनो का छोटा सा एक गॉव है...

Wednesday, January 6, 2010

देश मेरा..

कच्चे रंग हैं मेरे देश के
अठाईस अंग हैं मेरे देश के
कुछ हलके, कुछ सुनहरे ढंग हैं मेरे देश के..
कुछ फीके, कुछ चटपटे प्रसंग हैं मेरे देश के..

धरती बाट ली, भाषा छांट ली
उर्दू, फारसी, संस्कृत की शाखा  काट ली
हर अंग की परिभाषा गाँठ ली
सरहद की हर जगह पाबंदी बाँध ली

फिर भी मगर सर से पॉव तक
कश्मीर की बर्फ से चेन्नई की ताप तक
गाँधी के नोट से सचिन की चोंट तक
सन्डे के अंडे से मास्टरजी के डंडे तक
यह कोने से वो कोना, किरणों के साथ ओरना बिछोना
बचपन की सांप सीधी, और वो आँख मिचोना
एहसास वही ..अलफ़ाज़ अलग हैं मेरे देश के
इन्द्रधनुष एक बस रंगों के अंदाज़ अलग हैं मेरे देश के .