Saturday, November 8, 2008

ज़िन्दगी की दौड़


रात के अंधेरे में, बंद सीपी सी आंखों से,

झांक कर हलचल छानती हूँ कहीं,
दायी तरफ़ कुछ मचलता तो आज भी है...

एक सवाल पूछती हूँ रोज़ उस ही लाल मोती से,
कल किस गली किस रासते मुड जाना है मुझे,
कोई मंजिल नही कोई हासिल नही फ़िर भी,
किस सफर की तलाश में जाना है मुझे,
ज़िन्दगी के मायने मेरे भी कुछ होंगे,
तकदीर में मेरी साहिल भी कुछ होंगे,
रोज़ उठ कर भागती हूँ कहीं तो, किसी और,
ढुन्ढ्ती हूँ रोज़ नई मंजिल नए छोर,
खो जाती हूँ अनंत में कहीं,
सो जाती हूँ थक कर वहीँ,
फ़िर चाय की महक और पहली अंगडाई के साथ,
शुरू कर देती हूँ ज़िन्दगी की वही दौड़......

2 comments:

Unknown said...

Nice lines... keep it up

anurag said...

सफ़र ही हासिल है मुसाफिर का,
मंजिलों की परवाह क्यों,कौन करे ?