Friday, September 26, 2008

आज ही..

आज यह शाम, कोई गीत नही था गुनगुनाने को
आज यह शाम, कोई आस नही थी पाने को,
आज सूरज तो आया पर रौशनी का साया नही था छाने को
मौसम तो सावन ही था पर बारिश नही थी भीग जाने को
लोग तो कईं चले थे साथ मगर,
तुम ही नही थे आज दिल को छु जाने को,
आंखों में सपने का इन्द्रधनुष तो बनाया था कभी
ख्वाहिश का रंग कोई था नही मगर आज ही पाने को,
प्यार का समुन्दर भी तो छुपाया था कहीं,
आज ही मगर एक बूंद नही थी प्यास बुझाने को
मरना तो चाहते थे हम भी मगर,
कोई आँखें ही नही थी आज ही डूब जाने को...

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