Wednesday, January 6, 2010

देश मेरा..

कच्चे रंग हैं मेरे देश के
अठाईस अंग हैं मेरे देश के
कुछ हलके, कुछ सुनहरे ढंग हैं मेरे देश के..
कुछ फीके, कुछ चटपटे प्रसंग हैं मेरे देश के..

धरती बाट ली, भाषा छांट ली
उर्दू, फारसी, संस्कृत की शाखा  काट ली
हर अंग की परिभाषा गाँठ ली
सरहद की हर जगह पाबंदी बाँध ली

फिर भी मगर सर से पॉव तक
कश्मीर की बर्फ से चेन्नई की ताप तक
गाँधी के नोट से सचिन की चोंट तक
सन्डे के अंडे से मास्टरजी के डंडे तक
यह कोने से वो कोना, किरणों के साथ ओरना बिछोना
बचपन की सांप सीधी, और वो आँख मिचोना
एहसास वही ..अलफ़ाज़ अलग हैं मेरे देश के
इन्द्रधनुष एक बस रंगों के अंदाज़ अलग हैं मेरे देश के .

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