पलकें मेरी नींद से सहम जाती हैं, या ख्वाबों से घबराती हैं
अंगडआइयों से इठलाती हैं, या जुगनू से शर्माती हैं,
रात के सन्नाटे से या अंधेरे की तन्हाईयों से चौंक जाती हैं,
चांदनी से ऑंखें लड़ाती, सूरज की पहली किरणों से आखें चुराती हैं
दौड़ती हैं चारों और, सायों से खेल आती हैं,
आकृतियाँ बनाके हवा में, खुद के बुझ से झुक जाती हैं,
थक जाती हैं और वीरानियों में कहीं थम जाती हैं ...
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