Wednesday, December 30, 2009

चाँद

छुप के खो जाए वो क्यों ना भला बादलों के आँचल में
रूठ के सो जाए वो भले ही रात के काजल में
भटक जाए शायद कभी किसी अजनबी के पीछे
अटक जाए शायद उसका भी दिल किसी तारे के नोक के पीछे
ऐ चाँद मेरे इतना जान ले तू , रोज़ रोज़ के इस लुका छुपी के खेल में 
निकलेगा एक दिन तो तू भी अपनी चाँदनी की तलाश में
ढूंड लेना हमे यहीं खड़े हैं हम..अपने एक ही चाँद की आस में.