Tuesday, April 14, 2009

त्रिवेणी

त्रिवेणी से प्रेरित:
1. रात को देखा खिड़की से, चाँद आधा है फलक पर,
तो तुम्हे रोटी जैसे चाँद बांटना भी सीख लिया अब.

या फ़िर तुमने धीरे से करवट बदली है रात में.

२. कौन कम्बक्त कहता है १२ महीने पुरा चाँद नही निकलता.
मेरे घर में दिन रात पायल पहन के ठुमकता है आजकल.

कोई ज्योतिष को जाके बता दो, कहता था वो मुझ पर अमावास भरी है.

३. वसंत आज सुबह अंगडाई ले रहा था की, सावन ने आके पानी फेर दिया
वसंत रूठ गया है इस साल वापस नही लौटेगा.

ऊपर से फ़िर किसी ने चिकोटी काटी होगी.

४. आंखों की कोर में तह कर रखी हैं यादें तुम्हारी,
रोने से डरते हैं आजकल कहीं सिलवटैँ न खुल जाए...

दिल की तिजोरी कहीं खो गई है बहुत दिनों से.

५. आंसों की बाढ़ में बह जाते हैं घर,
तुम आंखों की मेढ़ बना कर नई नींव रख दो.

घरोंदे सिर्फ़ इंट पत्थर के नही बनते.

Sunday, March 1, 2009

द्वंद

मन के द्वंद का अंत तलाशती हूँ
सागर के मज़्ह्दार में उठती लहरों के बीच
साहिल का अहसास तलाशती हूँ,
राहें तो कई गुजर गयी,
मंज़िल के अस्तित्व का वो विश्वास अब भी तलाशती हूँ ,
पलकों पर वो कई उम्मीद के साए
आंखों के उन काले घेरों के बीच खुद की आवाज़ तलाशती हूँ...

Saturday, November 8, 2008

ज़िन्दगी की दौड़


रात के अंधेरे में, बंद सीपी सी आंखों से,

झांक कर हलचल छानती हूँ कहीं,
दायी तरफ़ कुछ मचलता तो आज भी है...

एक सवाल पूछती हूँ रोज़ उस ही लाल मोती से,
कल किस गली किस रासते मुड जाना है मुझे,
कोई मंजिल नही कोई हासिल नही फ़िर भी,
किस सफर की तलाश में जाना है मुझे,
ज़िन्दगी के मायने मेरे भी कुछ होंगे,
तकदीर में मेरी साहिल भी कुछ होंगे,
रोज़ उठ कर भागती हूँ कहीं तो, किसी और,
ढुन्ढ्ती हूँ रोज़ नई मंजिल नए छोर,
खो जाती हूँ अनंत में कहीं,
सो जाती हूँ थक कर वहीँ,
फ़िर चाय की महक और पहली अंगडाई के साथ,
शुरू कर देती हूँ ज़िन्दगी की वही दौड़......

Friday, September 26, 2008

आज ही..

आज यह शाम, कोई गीत नही था गुनगुनाने को
आज यह शाम, कोई आस नही थी पाने को,
आज सूरज तो आया पर रौशनी का साया नही था छाने को
मौसम तो सावन ही था पर बारिश नही थी भीग जाने को
लोग तो कईं चले थे साथ मगर,
तुम ही नही थे आज दिल को छु जाने को,
आंखों में सपने का इन्द्रधनुष तो बनाया था कभी
ख्वाहिश का रंग कोई था नही मगर आज ही पाने को,
प्यार का समुन्दर भी तो छुपाया था कहीं,
आज ही मगर एक बूंद नही थी प्यास बुझाने को
मरना तो चाहते थे हम भी मगर,
कोई आँखें ही नही थी आज ही डूब जाने को...

Saturday, April 12, 2008

छोटी सी गुज़ारिश

बस इतनी सी गुज़ारिश है तुमसे,
दिल की उम्मीद को मेरी, साँसों से अपनी यूं ही बांधें रखना,
भूल के जो तुमने, नब्ज़ कभी अपनी जो थाम ली,
आरजू का मेरी, जनाज़ा तुम्हारे दिल की गलियों से ही गुजरेगा....

नीला ख्वाब

नीली स्याही से तुमने कागज़ पे जो ख्वाब लिखा था कभी,
पानी की कुछ बूंदों ने वो सब और फैला दिया,
लब्ज़ टटोल रही थी गीले नीले उस कागज़ पर जिस वक्त,
तुमने आकर आंखों में मेरी, वही नीला ख्वाब ज़बानी पढ़ कर सुना दिया।