कच्चे रंग हैं मेरे देश के
अठाईस अंग हैं मेरे देश के
कुछ हलके, कुछ सुनहरे ढंग हैं मेरे देश के..
कुछ फीके, कुछ चटपटे प्रसंग हैं मेरे देश के..
धरती बाट ली, भाषा छांट ली
उर्दू, फारसी, संस्कृत की शाखा काट ली
हर अंग की परिभाषा गाँठ ली
सरहद की हर जगह पाबंदी बाँध ली
फिर भी मगर सर से पॉव तक
कश्मीर की बर्फ से चेन्नई की ताप तक
गाँधी के नोट से सचिन की चोंट तक
सन्डे के अंडे से मास्टरजी के डंडे तक
यह कोने से वो कोना, किरणों के साथ ओरना बिछोना
बचपन की सांप सीधी, और वो आँख मिचोना
एहसास वही ..अलफ़ाज़ अलग हैं मेरे देश के
इन्द्रधनुष एक बस रंगों के अंदाज़ अलग हैं मेरे देश के .
Wednesday, January 6, 2010
Wednesday, December 30, 2009
सपनो का कारवां
बादलों से चाँद का है मीलों का फासला ,
मुसाफिर को मिले जाने कब सीढ़ियों का रास्ता .
आज फिर रात की राह में चल पड़ेगा सपनो का कारवां
धुंडने फिर वही सिफर का वास्ता.
चाँद
छुप के खो जाए वो क्यों ना भला बादलों के आँचल में
रूठ के सो जाए वो भले ही रात के काजल में
भटक जाए शायद कभी किसी अजनबी के पीछे
अटक जाए शायद उसका भी दिल किसी तारे के नोक के पीछे
ऐ चाँद मेरे इतना जान ले तू , रोज़ रोज़ के इस लुका छुपी के खेल में
निकलेगा एक दिन तो तू भी अपनी चाँदनी की तलाश में
ढूंड लेना हमे यहीं खड़े हैं हम..अपने एक ही चाँद की आस में.
रूठ के सो जाए वो भले ही रात के काजल में
भटक जाए शायद कभी किसी अजनबी के पीछे
अटक जाए शायद उसका भी दिल किसी तारे के नोक के पीछे
ऐ चाँद मेरे इतना जान ले तू , रोज़ रोज़ के इस लुका छुपी के खेल में
निकलेगा एक दिन तो तू भी अपनी चाँदनी की तलाश में
ढूंड लेना हमे यहीं खड़े हैं हम..अपने एक ही चाँद की आस में.
Thursday, November 5, 2009
नींद..
पलकें मेरी नींद से सहम जाती हैं, या ख्वाबों से घबराती हैं
अंगडआइयों से इठलाती हैं, या जुगनू से शर्माती हैं,
रात के सन्नाटे से या अंधेरे की तन्हाईयों से चौंक जाती हैं,
चांदनी से ऑंखें लड़ाती, सूरज की पहली किरणों से आखें चुराती हैं
दौड़ती हैं चारों और, सायों से खेल आती हैं,
आकृतियाँ बनाके हवा में, खुद के बुझ से झुक जाती हैं,
थक जाती हैं और वीरानियों में कहीं थम जाती हैं ...
अंगडआइयों से इठलाती हैं, या जुगनू से शर्माती हैं,
रात के सन्नाटे से या अंधेरे की तन्हाईयों से चौंक जाती हैं,
चांदनी से ऑंखें लड़ाती, सूरज की पहली किरणों से आखें चुराती हैं
दौड़ती हैं चारों और, सायों से खेल आती हैं,
आकृतियाँ बनाके हवा में, खुद के बुझ से झुक जाती हैं,
थक जाती हैं और वीरानियों में कहीं थम जाती हैं ...
Wednesday, June 10, 2009
मुसाफिर
नया आघाज़ या पहला पूर्णविराम,
नया उजाला या रात का अंजाम,
ताजे पल्लव या पतझङ का आराम,
नए रास्ते या मंजिलें गुमनाम!
नया उजाला या रात का अंजाम,
ताजे पल्लव या पतझङ का आराम,
नए रास्ते या मंजिलें गुमनाम!
Tuesday, April 14, 2009
त्रिवेणी
त्रिवेणी से प्रेरित:
1. रात को देखा खिड़की से, चाँद आधा है फलक पर,
तो तुम्हे रोटी जैसे चाँद बांटना भी सीख लिया अब.
या फ़िर तुमने धीरे से करवट बदली है रात में.
२. कौन कम्बक्त कहता है १२ महीने पुरा चाँद नही निकलता.
मेरे घर में दिन रात पायल पहन के ठुमकता है आजकल.
कोई ज्योतिष को जाके बता दो, कहता था वो मुझ पर अमावास भरी है.
३. वसंत आज सुबह अंगडाई ले रहा था की, सावन ने आके पानी फेर दिया
वसंत रूठ गया है इस साल वापस नही लौटेगा.
ऊपर से फ़िर किसी ने चिकोटी काटी होगी.
४. आंखों की कोर में तह कर रखी हैं यादें तुम्हारी,
रोने से डरते हैं आजकल कहीं सिलवटैँ न खुल जाए...
दिल की तिजोरी कहीं खो गई है बहुत दिनों से.
५. आंसों की बाढ़ में बह जाते हैं घर,
तुम आंखों की मेढ़ बना कर नई नींव रख दो.
घरोंदे सिर्फ़ इंट पत्थर के नही बनते.
1. रात को देखा खिड़की से, चाँद आधा है फलक पर,
तो तुम्हे रोटी जैसे चाँद बांटना भी सीख लिया अब.
या फ़िर तुमने धीरे से करवट बदली है रात में.
२. कौन कम्बक्त कहता है १२ महीने पुरा चाँद नही निकलता.
मेरे घर में दिन रात पायल पहन के ठुमकता है आजकल.
कोई ज्योतिष को जाके बता दो, कहता था वो मुझ पर अमावास भरी है.
३. वसंत आज सुबह अंगडाई ले रहा था की, सावन ने आके पानी फेर दिया
वसंत रूठ गया है इस साल वापस नही लौटेगा.
ऊपर से फ़िर किसी ने चिकोटी काटी होगी.
४. आंखों की कोर में तह कर रखी हैं यादें तुम्हारी,
रोने से डरते हैं आजकल कहीं सिलवटैँ न खुल जाए...
दिल की तिजोरी कहीं खो गई है बहुत दिनों से.
५. आंसों की बाढ़ में बह जाते हैं घर,
तुम आंखों की मेढ़ बना कर नई नींव रख दो.
घरोंदे सिर्फ़ इंट पत्थर के नही बनते.
Sunday, March 1, 2009
द्वंद
मन के द्वंद का अंत तलाशती हूँ
सागर के मज़्ह्दार में उठती लहरों के बीच
साहिल का अहसास तलाशती हूँ,
राहें तो कई गुजर गयी,
मंज़िल के अस्तित्व का वो विश्वास अब भी तलाशती हूँ ,
पलकों पर वो कई उम्मीद के साए
आंखों के उन काले घेरों के बीच खुद की आवाज़ तलाशती हूँ...
सागर के मज़्ह्दार में उठती लहरों के बीच
साहिल का अहसास तलाशती हूँ,
राहें तो कई गुजर गयी,
मंज़िल के अस्तित्व का वो विश्वास अब भी तलाशती हूँ ,
पलकों पर वो कई उम्मीद के साए
आंखों के उन काले घेरों के बीच खुद की आवाज़ तलाशती हूँ...
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