Tuesday, February 15, 2011

तुम..


मेरे सपनो के खुले आसमान  पर तुमने,  अपने ख्वाबों की छत चुपके से डाल दी,
मेरी उड़ान की उच्चाई, बाहों की रस्सी से फिर चुपके से यूँ थाम ली..
इस पंछी को अब..बादल पर वो घोसला सच्चा सा लगता है..
हर सपना जाने क्यों और पक्का सा लगता  है..




Sunday, January 31, 2010

आँखें

यह जो मेरे पलकों की छांव है
उसके पीछे मेरे सपनो का छोटा सा एक गॉव है


एक नदी है जो कभी झरती है दिल की हलचल से
एक कंदील है जो चमकती है तुम्हारी आहट से
एक नन्हा सा घोंसला है दिल के पंछी का
एक आसमान है ऊँची उड़ान का ..

होसले की एक इमारत भी है
जो डगमगाती है पर बुलंद है
एक उम्मीद की सीढ़ी है जिसमे विश्वास की पैडी है


एक कच्चा पक्का पैड है  यादों का
जिसमें नए पुराने रंगों के फूल हैं
 कुछ मुरझाये फूलों पे ओस की नमी है
कुछ बंजर शाखों पे पल्लव की कमी है
मजबूत तना पर शाखें कमज़ोर हैं
कुछ नयी हरी कोपलें, कुछ अनछुई सपनो की कलियाँ हैं
पैड से  गुजरती कई पुरानी यादों की गलियां हैं


यह जो मेरे पलकों की छांव है
उसके पीछे मेरे सपनो का छोटा सा एक गॉव है...

Wednesday, January 6, 2010

देश मेरा..

कच्चे रंग हैं मेरे देश के
अठाईस अंग हैं मेरे देश के
कुछ हलके, कुछ सुनहरे ढंग हैं मेरे देश के..
कुछ फीके, कुछ चटपटे प्रसंग हैं मेरे देश के..

धरती बाट ली, भाषा छांट ली
उर्दू, फारसी, संस्कृत की शाखा  काट ली
हर अंग की परिभाषा गाँठ ली
सरहद की हर जगह पाबंदी बाँध ली

फिर भी मगर सर से पॉव तक
कश्मीर की बर्फ से चेन्नई की ताप तक
गाँधी के नोट से सचिन की चोंट तक
सन्डे के अंडे से मास्टरजी के डंडे तक
यह कोने से वो कोना, किरणों के साथ ओरना बिछोना
बचपन की सांप सीधी, और वो आँख मिचोना
एहसास वही ..अलफ़ाज़ अलग हैं मेरे देश के
इन्द्रधनुष एक बस रंगों के अंदाज़ अलग हैं मेरे देश के .

Wednesday, December 30, 2009

सपनो का कारवां


बादलों से चाँद का  है मीलों  का  फासला , 
मुसाफिर  को  मिले  जाने  कब  सीढ़ियों  का  रास्ता .
आज  फिर  रात  की  राह  में  चल  पड़ेगा  सपनो  का  कारवां 
धुंडने  फिर  वही  सिफर  का  वास्ता.

चाँद

छुप के खो जाए वो क्यों ना भला बादलों के आँचल में
रूठ के सो जाए वो भले ही रात के काजल में
भटक जाए शायद कभी किसी अजनबी के पीछे
अटक जाए शायद उसका भी दिल किसी तारे के नोक के पीछे
ऐ चाँद मेरे इतना जान ले तू , रोज़ रोज़ के इस लुका छुपी के खेल में 
निकलेगा एक दिन तो तू भी अपनी चाँदनी की तलाश में
ढूंड लेना हमे यहीं खड़े हैं हम..अपने एक ही चाँद की आस में.

Thursday, November 5, 2009

नींद..

पलकें मेरी नींद से सहम जाती हैं, या ख्वाबों  से घबराती हैं
अंगडआइयों से  इठलाती हैं, या जुगनू से शर्माती हैं,
रात के सन्नाटे से  या  अंधेरे  की  तन्हाईयों  से  चौंक  जाती  हैं,
चांदनी से ऑंखें लड़ाती, सूरज की पहली किरणों से आखें चुराती हैं
दौड़ती हैं चारों और, सायों से खेल आती हैं,
आकृतियाँ बनाके हवा में, खुद के बुझ से झुक जाती हैं,
थक जाती हैं और वीरानियों में कहीं थम  जाती  हैं ...

Wednesday, June 10, 2009

मुसाफिर

नया आघाज़ या पहला पूर्णविराम,
नया उजाला या रात का अंजाम,
ताजे पल्लव या पतझङ का आराम,
नए रास्ते या मंजिलें गुमनाम!